रतनमणि डोभाल
हरिद्वार। तस्वीर बोलती है। कुंभ हो रहा है। मथनी की रस्सी घुमाई जा रही है और अमृत छलकने लगा है। अमृत प्राप्त करने की होड़ उतनी ही पुरानी जितनी कुंभ की। देवता हमेशा ही चालाक तथा धुर्त रहे हैं और आज के आधुनिक युग में भी हैं। देवता सांप की रस्सी बनाते थे और खुद पूछ पकड़ते थे और मुंडी दैत्यों को पकड़ा देते थे। दैत्य तब के मजदूर रहे होंगे और देवता राज करने वाले। चालक देवता अमृत खुद तक लेते थे और विष दैत्यों के हिस्से आता था। शिव उनके नेता रहे होंगे इसलिए अपने लोगों की रक्षा करने के लिए उन्होंने जहर पिया इसलिए उनका कंठ नीला पड़ गया होगा।
यह संघर्ष आधुनिक युग के कुंभ में भी दिखता है। तस्वीर बता रही है किस तरह अमृत निकाला और छक्का जा रहा है। मेला भवन सीसीआर के पीछे गंगा घाट नवीनीकरण किया गया। स्टील की रेलिंग लगाई गई। घाट पर सौंदर्यीकरण के लिए पेंटिंग की योजना के तहत दीवार पर पत्थर लगाया गया। पुलिस ने रेलिंग व पत्थर को श्रद्धालुओं के सुरक्षा के मद्देनजर सही नहीं माना। जिस कारण आज उखाड़ने का काम शुरू हो गया है। इससे पता चलता है कि मेलाधिष्ठान तथा कार्यकारी विभागों में कोई समन्वय नहीं है और सभी ज्यादा से ज्यादा अमृत निकालने की होड़ लगी है। केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक पहले ही आरोप लगा चुके हैं कि हर की पैड़ी सौंदर्यीकरण की उनकी 35 करोड़ की योजना बर्बाद कर दी गई है।

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