मनोज सैनी
शिमला। बीते दिनों हुए राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग के बाद हिमाचल प्रदेश की सियासत में हलचलें तेज हो गई थी। राज्यसभा की एकमात्र सीट के लिए हुए चुनाव में कांग्रेस के 6 विधायकों ने पार्टी लाइन से हटकर बीजेपी के लिए क्रॉस वोटिंग की थी। सियासी संकट के बीच सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने बीजेपी के 15 विधायकों की अप्रत्यक्ष मदद से पहला टेस्ट पास कर लिया है।पर्यवेक्षक डीके शिवकुमार और भूपेंद्र सिंह हुड्डा शिमला के सिसिल होटल में एक-एक विधायक से चर्चा कर रहे थे।
हिमाचल प्रदेश की राजनीति में भूचाल लाने वाले कांग्रेस के छह बागी विधायकों पर स्पीकर कुलदीप पठानिया ने अपना फैसला सुनाते हुए कांग्रेस के सभी छह बागी विधायकों सुधीर शर्मा (धर्मशाला) राजिंदर राणा (सुजानपुर), इंद्र दत्त लखनपाल (बड़सर), रवि ठाकुर (लाहौल स्फीति), चैतन्य शर्मा (गगरेट), देविंदर भुट्टो (कुटलेहर) की सदस्यता खत्म कर दी गई है। स्पीकर कुलदीप पठानिया ने कहा कि पार्टी व्हिप के उल्लंघन की वजह से उन पर दलबदल विरोधी कानून का प्रावधान लागू होता है और इस वजह से सदस्यता तुरंत प्रभाव से खत्म कर दी गई है।
कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं बागी
सदस्यता छीने जाने के फैसले को कांग्रेस के बागी विधायक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं। स्पीकर कुलदीप पठानिया ने भी कहा कि यह फैसला अंतिम नहीं है और इसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। हालांकि, बागी विधायकों की तरफ से खबर लिखे जाने तक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।
सदस्यता छिन जाने का क्या होगा असर
बागी विधायकों की सदस्यता छिन जाने के बाद बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का संकट कम हो जाएगा? 68 सदस्यीय विधानसभा में अब बहुमत का आंकड़ा बदल गया है। 6 की विधायकी खत्म हो जाने के ब अब सदन में 62 सदस्य बच गए हैं। अब सरकार को बहुमत लिए 32 विधायकों की आवश्यकता है, जबकि कांग्रेस के पास अब 34 विधायक बचे हैं। भाजपा के पास 25 विधायक हैं तो 3 निर्दलीय विधायकों का साथ भी अब उसे हासिल हो चुका है। कांग्रेस के पास अब भी संख्याबल दिख रहा है, लेकिन असली संकट पार्टी में फूट और गुटबाजी है।

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