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भाजपा के वरिष्ठ नेता और गंगा सभा के पूर्व अध्यक्ष अशोक त्रिपाठी ने अर्धकुंभ को कुंभ घोषित करने अपनी ही सरकार को घेरा। कहा सरकार को धार्मिक परंपराओं और संस्कृति में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं।

ब्यूरो

हरिद्वार। भाजपा के वरिष्ठ नेता, गंगा सभा (रजि0), हरिद्वार के पूर्व अध्यक्ष तथा मेला प्राधिकरण के पूर्व उपाध्यक्ष अशोक त्रिपाठी ने प्रेस क्लब हरिद्वार में पत्रकारों से वार्ता कर उत्तराखंड की धामी सरकार द्वारा अर्धकुंभ को कुंभ घोषित करने की कोशिश करने पर आड़े हाथों लेते हुए धामी सरकार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। जिससे प्रदेश के राजनीतिक और धार्मिक हलकों में हलचल पैदा हो गई है। पत्रकारों से वार्ता करते हुए श्री त्रिपाठी ने कहा कि सरकार अर्धकुंभ को कुंभ घोषित करने की कोशिश कर रही है, जो सनातन परंपराओं और शास्त्रीय मान्यताओं के विरुद्ध है।

उन्होंने कहा कि सरकार का दायित्व कुंभ पर्व के दौरान सुरक्षा और व्यवस्थाओं को सुचारू रखना है, लेकिन उसे धार्मिक परंपराओं और संस्कृति में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अर्धकुंभ को कुंभ मेला का नाम देना शास्त्रों और धार्मिक ग्रंथों के विपरीत है। उनका कहना था कि पिछले लगभग 300 वर्षों के इतिहास में कभी भी अर्धकुंभ को कुंभ नहीं कहा गया, फिर आज इसे कुंभ का नाम क्यों दिया जा रहा है। अशोक त्रिपाठी ने कहा कि हरिद्वार केवल एक शहर नहीं बल्कि मां गंगा की पवित्र धारा से जुड़ा सनातन आस्था का केंद्र है। उन्होंने कहा कि सरकार यदि इस तीर्थ को पर्यटन स्थल के रूप में प्रचारित करेगी तो इससे सनातन संस्कृति को नुकसान पहुंचेगा।उन्होंने कहा कि श्रद्धालु हरिद्वार घूमने नहीं बल्कि आस्था, श्रद्धा और धार्मिक भावना के साथ आते हैं।

अशोक त्रिपाठी ने कहा कि गंगा की अविरल और निर्मल धारा ही हरिद्वार की वास्तविक पहचान है। उनका कहना था कि सरकार चाहे हर की पौड़ी पर करोड़ों रुपये खर्च कर दे, लेकिन यदि मां गंगा में जल नहीं रहेगा तो यहां कोई नहीं आएगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि दीपावली के समय जब गंगा का जल अस्थायी रूप से मोड़ा जाता है, तब हरिद्वार की रौनक कम हो जाती है और घाट लगभग सूने दिखाई देते हैं। लेकिन जैसे ही गंगा की धारा वापस आती है, श्रद्धालुओं की भीड़ फिर उमड़ पड़ती है। उन्होंने कहा कि संध्या के समय हर की पौड़ी पर होने वाली मां गंगा की आरती ही हरिद्वार की असली दिव्यता और भव्यता है।

उन्होंने कहा कि सनातन धर्म के लोग बनाए जा रहे सीसीआर टावर या आधुनिक निर्माण देखने नहीं आएंगे, बल्कि मां गंगा के दर्शन, स्नान और आरती के आध्यात्मिक अनुभव के लिए आते हैं।अशोक त्रिपाठी ने कहा कि पर्यटन को बढ़ावा देने की सोच कभी-कभी तीर्थ की पवित्रता को भी प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड में लोग मुख्य रूप से तीर्थाटन के लिए आते हैं, न कि केवल घूमने के उद्देश्य से।उन्होंने चारधाम यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि केदारनाथ मंदिर, बद्रीनाथ मंदिर, गंगोत्री मंदिर, यमुनोत्री मंदिर और हेमकुंड साहिब जैसे पवित्र धामों की पहचान ही तीर्थाटन से है।

अंकिता भंडारी कांड का भी किया जिक्र
बातचीत के दौरान उन्होंने अंकिता भंडारी प्रकरण का जिक्र करते हुए कहा कि पर्यटन के नाम पर गंगा किनारे बनाए गए रिसॉर्ट और अवैध गतिविधियों ने कई बार गंभीर घटनाओं को जन्म दिया है, जो देवभूमि की मर्यादा के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि हरिद्वार की पहचान हजारों वर्षों से एक पवित्र तीर्थ के रूप में रही है। देश-विदेश से लोग अपने पूर्वजों की अस्थियों का विसर्जन करने और मोक्ष की कामना से यहां आते हैं। इसलिए सरकार को चाहिए कि इस पवित्र स्थल की धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक मर्यादा को बनाए रखते हुए विकास की योजनाएं तैयार करे।अशोक त्रिपाठी ने कहा कि यदि श्री महा गंगा सभा की बैठक होगी तो वह स्वयं इस मुद्दे को वहां भी उठाएंगे, ताकि तीर्थ की परंपरा और मर्यादा को सुरक्षित रखा जा सके। हरिद्वार की धार्मिक परंपराओं और सरकार की नीतियों के बीच उठे इस सवाल ने अब तीर्थ नगरी में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

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