कुणाल दरगन
हरिद्वार। अंकिता हत्याकांड के मुख्य आरोपी पुलकित आर्य का वनंत्रा रिजॉर्ट पर महज चंद मिनट चलकर ही पीला पंजा हांफ गया। देखा जाए तो महज नाखून भर रिजॉर्ट के उखाड़े गए है, इधर बयानवीरों ने धामी सरकार के पक्ष में गला फाड़ फाड़ कर आसमान सिर पर उठा लिया। वे चुनमुन की तरह बस जेसीबी के पंजे को आगे पीछे होता देखकर तालियां बजा रहे है, खुश हो रहे है। रात भर खुशी में झूमकर नाचते रहे। चिल्लाते रहे। चिल्लाते भी रहेंगे।अरे बयानवीरों मौके पर जाकर हकीकत भी तो देखो। बस चंद दीवारें टूटी है। पूरे रिजॉर्ट की दीवारें-लिंटर अब भी शान से खडे है और बेटी के कत्ल की खूनी पटकथा की दास्तां बयां कर रहे है। हां पब्लिक ने इंसाफ जरूर कर दिया। फैक्ट्री फूंक दी। रिजॉर्ट तहस नहस कर दिया।

बड़ा सवाल यह है कि लाडली को कत्ल कर कई दिन तक पुलकित खुलेआम घूमता रहा। जाहिर है कि उसने बचाव के तौर तरीके भी खोजे होंगे। किस किस के संपर्क में वह आया। किस किस से उसने बातचीत की, यह साफ हो। उसकी कॉल डिटेल रेकार्ड निकाली जाए। वह कहां कहां गया। यह भी साफ हो। सीसीटीवी कैमरे क्यों खराब थे, डीवीआर कहां है, इसका सच भी सामने आएं। बेहद शातिर पुलकित आर्य को कौन कौन बचा रहा था, इसकी भी जांच हो। युवती के मोबाइल फोन का पूरा खंगाला जाए, उससे भी सच की किरणें बाहर आएंगी। जाहिर है कि पुलकित एक मझे हुए अपराधी सरीखी मानसिकता रखता है लिहाजा तभी वह बचने की हर जुगत में जुटा रहा। पब्लिक ने जब उसे धुना तब भी उसके चेहरे पर शिकन तक नहीं थी। कुल मिलाकर सीबीआई जांच ही इस पूरे हत्याकांड का एकमात्र विकल्प है, वरना चंद दिनों बाद अंकिता भंडारी महज एक याद बनकर रह जाएगी।

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